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75 - 'धर्म एक है'

श्री कृष्ण कहते हैं कि ( 3.35) अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए - परधर्म से गुणरहित स्वधर्म अति उत्तम है। स्वधर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और परधर्म भय को देने वाला है। यह जटिल

74 - 'श्रद्धा' आनंद लाती है

श्री कृष्ण कहते हैं (3.31) कि जो मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं।   श्रद्धा का अर्थ

73. 'समर्पण की कला'

श्री कृष्ण ने अर्जुन (3.30 ) से कहा मुझ अंतर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशा रहित, ममतारहित और ज्वररहित होकर युद्ध कर। यह

72. 'धारणाओं' का कैदी

श्री कृष्ण कहते हैं कि 'प्रकृति के गुणों से अत्यंत मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतः न समझने वाले मंदबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतः जानने

71 . कोई किसी से 'श्रेष्ठ या निम्न नहीं'

श्री कृष्ण कहते हैं कि ( 3.27) वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अंतः करण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता

70 . उचित नहीं 'जल्दबाजी '

एक फल विकसित होने और पकने के लिए अपने मूल पेड़ से पोषक तत्व प्राप्त करता है। फिर वह अपनी यात्रा शुरू करने के लिए पेड़ से अलग हो जाता है। मूल वृक्ष से मुक्ति की यात्रा से अंत

69. सीखिए 'गीता' को जीवन में लागू करना’

दैनिक जीवन में हम अपनी पसंद के कुछ कर्मों से जुड़ जाते हैं। इसे आसक्ति कहते हैं। हम कुछ कर्मों से नफरत की वजह से अलग हो जाते जिसे विरक्ति कहा जाता है। परन्तु श्री कृष्ण एक

68. एक जैसी हो 'कथनी और करनी'

बच्चे दुनिया को समझने, नई चीजें, शिष्टाचार, व्यवहार आदि सीखने के लिए अपने माता-पिता की ओर देखते हैं और इसीलिए कहा जाता है कि बच्चे को पालने का सबसे अच्छा तरीका है, कथनी और

67. 'श्रेष्ठता का मार्ग'

श्री कृष्ण हमें विश्वास दिलाते हैं। कि ( 3.19 ) अनासक्ति (आसक्ति और विरक्ति को पार करना) सहित कर्म करने से व्यक्ति श्रेष्ठता को प्राप्त होता है। वह राजा जनक ( 3.20 ) का उदाहरण देते

66. 'समर्पण' या ' 'संघर्ष'

जीने के दो तरीके हैं- एक है 'संघर्ष' और दूसरा 'समर्पण'। समर्पण युद्ध में पराजितों के समर्पण की तरह असहाय समर्पण नहीं है, यह जागरूकता और सक्रिय स्वीकृति के साथ समर्पण

65  'निःस्वार्थ कर्म 'से बढ़ कर कुछ नहीं

जल पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है और श्री कृष्ण निःस्वार्थ कार्यों को समझाने के लिए वर्षा का उदाहरण ( 3.14) देते हैं। मूल रूप से बारिश एक चक्र का एक हिस्सा है, जहां गर्मी के कारण

64. 'कर्म' के बिना शरीर बेकार हो जाएगा

श्री कृष्ण कहते हैं (3.8), तू नियत कर्तव्य कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर बेकार हो जाएगा। मानव शरीर के अस्तित्व के

63. 'कर्म' का महत्व'

यदि हम कर्म के कर्ता नहीं हैं, तो कर्ता कौन है ? श्री कृष्ण जवाब देते हैं (3.5) “कोई भी कर्म किए  बिना एक पल भी नहीं रह सकता क्योंकि सभी को कर्म करने के लिए प्रकृति से पैदा हुए

62. 'मोक्ष' के दो मार्ग

श्री कृष्ण उत्तर देते हैं (3.3), 'जैसा कि मैंने पहले कहा, इस संसार में मोक्ष के दो मार्ग हैं-ज्ञानी ज्ञान के माध्यम से और योगियों के लिए कर्म के मार्ग से।" यह श्लोक इंगित करता

61. 'अनिश्चित मन' के लिए निश्चितता

  गीता के तीसरे अध्याय को 'कर्म योग' के रूप में जाना जाता है, जो श्लोक 2.71 का विस्तार है, जहां श्री कृष्ण ने कहा कि 'निर- अहंकार' शाश्वत अवस्था को प्राप्त करने का मार्ग

60 . विषाद से ज्ञानोदय तक

श्री कृष्ण कहते हैं (2.70) कि - जैसे विभिन्न नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, उसी प्रकार वही पुरुष परम शान्ति

59. 'इंद्रियों' को अपने नियंत्रण में रखो

श्री कृष्ण कहते हैं, " सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, वह एक ज्ञानी के लिए दिन के समान है और जिस दिन के समय नाशवान जन सांसारिक सुख की प्राप्ति के लिए जागते

58 - 'इच्छाओं' के विनाशकारी परिणाम

श्री कृष्ण कहते हैं कि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु चलाती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय पुरुष की

57 - अपनी 'भावनाओं' को काबू में रखो

श्री कृष्ण कहते हैं 'अयुक्त (असंतुलित) मनुष्य' में बुद्धि और भावना दोनों नहीं होतीं । परिणामस्वरूप उसे न तो शांति मिलती है और न ही खुशी । श्री कृष्ण ने यहां समत्व पर जोर

56 . जीवन में 'संतोष' है सबसे बड़ा धन

श्री कृष्ण कहते हैं कि मन की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही

55. 'दुष्चक्र' में फंसने से बचें

दुष्चक्र और गुणी चक्र घटनाओं का एक क्रम है जहां एक घटना दूसरे की ओर ले जाती है और परिणामस्वरूप आपदा या खुशी में बदलती है। यदि खर्च आय से अधिक है और व्यक्ति उधार एवं कर्ज के

54. 'इंद्रियों' के चक्कर में फंसने से बचो

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपशचितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः श्री कृष्ण ने अर्जुन को सावधान किया कि अशांत इंद्रियां बुद्धिमान पुरुष के मन को भी जबरन

53. ’इंद्रिय वस्तुओं’ की लालसा को छोडऩा

श्रीकृष्ण कहते हैं (2.59)  इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले व्यक्ति से इन्द्रिय वस्तुएं दूर हो जाती हैं, लेकिन रस (लालसा) जाती नहीं और लालसा तभी समाप्त होती है

52. जरूरी है ’इंद्रियों’ पर नियंत्रण

श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसे कछुआ अपने अंगों को खोल के भीतर समेट लेता है, वैसे ही जब पुरुष इन्द्रियों को सब प्रकार विषयों से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है

कर्तापन' की भावना को छोडऩा

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम सफलता तथा असफलता जैसी ध्रुवियताओं को त्याग कर कार्य करोगे तो वह समत्व ही योग कहलाता है। दूसरे शब्दों में, हम जो कुछ भी करते हैं, वह

51. घृणा भी एक बंधन है (

हम किसी स्थिति, व्यक्ति या किसी कार्य के परिणाम के लिए तीन में से एक नामांकन करते हैं: शुभ, अशुभ या कोई नामांकन नहीं। श्रीकृष्ण इस तीसरी अवस्था का उल्लेख करते हैं और कहते हैं

50. ’सुख और दुख’ जीवन के हिस्से

श्रीकृष्ण कहते हैं (2.56) कि स्थितप्रज्ञ वह है जो न तो सुख से उत्तेजित होता है और न ही दुख से विक्षुब्ध होता है। वह राग, भय और क्रोध से मुक्त होता है।   यह श्लोक 2.38 का विस्तार है

49. ’वर्तमान क्षण’ में जीना

अर्जुन के प्रश्न के जवाब में श्रीकृष्ण कहते हैं कि (2.55), स्थितप्रज्ञ स्वयं से संतुष्ट होता है। दिलचस्प बात यह है कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न के दूसरे भाग का जवाब नहीं

48. ‘कामनाओं’ का त्याग कीजिए

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के 2.11 से 2.53 तक श्लोकों में सुध सांख्य (जगरूपता) का खुलासा किया, जो अर्जुन के लिए पूरी तरह से नयी बात थी। अर्जुन आगले श्लोक (2.54)  में ‘स्थितप्रज्ञ’ (जो

47. ’भ्रम’ से बचो

जीवन के सामान्य क्रम में जब हम एक ही विषय पर परस्पर विरोधी राय सुनते हैं, तो हम भ्रमित हो जाते हैं - चाहे वह समाचार, दर्शन, दूसरों के अनुभव और विश्वास हों। श्रीकृष्ण कहते हैं

46. क्या ’हमारा’ है और क्या नहीं

श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूप दलदल को भलीभांति पार कर जायेगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आनेवाले इस लोक और परलोक सम्बन्धी सभी भोगों से वैराग्य को

45. जन्म-मृत्यु के भ्रमपूर्ण बंधन

श्रीकृष्ण कहते हैं कि संतुलन बुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होनेवाले फल को त्यागकर जन्मरूपी बन्धन से मुक्त हो निर्विकार परमपद को प्राप्त हो जाते

44. संतुलित ’निर्णय’ लेना

हम सभी विभिन्न कारकों के आधार पर अपने, अपने परिवार और समाज के लिए कई निर्णय लेते हैं। श्रीकृष्ण हमें ये निर्णय लेने को अगले स्तर तक ले जाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जब वे

43. सीखिए ’तटस्थ’ रहना

हम अपने कार्यों और निर्णयों के साथ-साथ दूसरों के कार्यों को भी अच्छे या बुरे के रूप में नामकरण करने का आदी हो चुके है।   श्रीकृष्ण कहते हैं कि समबुद्धि युक्त पुरुष पुण्य

42. ’अहंकार’ से बचो

श्रीकृष्ण ने देखा कि अर्जुन अहंकार की भावना से अभिभूत है और यही उसके विषाद का कारण है। श्रीकृष्ण अर्जुन को सलाह देते हैं कि वह अहंकार को तोडऩे और स्वयं तक पहुँचने के लिए

41. खुद को जानने के लिए कीजिए बुद्धि का उपयोग

हमारे अंतरिक और बाहरी हिस्सों का मिलन ही योग है। इसे कर्म, भक्ति, सांख्य, बुद्धि जैसे कई मार्गों से प्राप्त किया जा सकता है। व्यक्ति अपनी प्रकृति के आधार पर उसके अनुकूल

प्रभुत्व की कुंजी है ’आत्मज्ञान’

कर्ण और अर्जुन कुंती से पैदा हुए थे लेकिन अंत में विपरीत पक्षों के लिए लड़े। अर्जुन के साथ महत्वपूर्ण लड़ाई के दौरान शाप के कारण कर्ण का युद्ध ज्ञान और अनुभव उसके बचाव में

कर्म फल' वह नहीं जो प्रतीत होता है

हम आमतौर पर यह समझने के लिए पर्याप्त समझदार नहीं हैं कि वर्तमान में हम जिस कर्मफल की इच्छा रखते हैं, वह आगे चलकर हमारे लिए अच्छा होगा या नहीं। जैसा कि एक असफल रिश्ते में होता

 

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