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40. 'कर्तापन' की भावना को छोडऩा

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम सफलता तथा असफलता जैसी ध्रुवियताओं को त्याग कर कार्य करोगे तो वह समत्व ही योग कहलाता है।

39. प्रभुत्व की कुंजी है ’आत्मज्ञान’

कर्ण और अर्जुन कुंती से पैदा हुए थे लेकिन अंत में विपरीत पक्षों के लिए लड़े। अर्जुन के साथ महत्वपूर्ण लड़ाई के दौरान शाप के कारण कर्ण का युद्ध ज्ञान और अनुभव उसके बचाव में नहीं आया। वह युद्ध हार गया और मारा गया।<

38. क्रिया और प्रतिक्रिया

श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमें कर्म करने का अधिकार है लेकिन कर्मफल पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। इसका यह मतलब नहीं है कि हम अकर्म की ओर बढ़ें, जो निष्क्रियता या परिस्थितियों की प्रतिक्रिया मात्र हैं।।

37. जीने का तरीका है ‘कर्मयोग’ीं

वही अर्जुन वही बाण’ – इन शब्दों का इस्तमाल अक्सर ऐसी स्थिति का वर्णन करने के लिए किया जाता है, जब एक सफल/सक्षम व्यक्ति काम पूरा करने में विफल रहता है।

36. 'कर्म फल' वह नहीं जो प्रतीत होता हैा

हम आमतौर पर यह समझने के लिए पर्याप्त समझदार नहीं हैं कि वर्तमान में हम जिस कर्मफल की इच्छा रखते हैं, वह आगे चलकर हमारे लिए अच्छा होगा या नहीं। जैसा कि एक असफल रिश्ते में होता है, एक समय में एक युगल एक साथ रहना चाहता है लेकिन कुछ समय बाद वे अलग होना चाहते हैं।

35. जीने का तरीका है ‘कर्मयोग’ ा

श्रीकृष्ण कहते हैं (2.47) कि हमें अपना कर्म करने का अधिकार है, लेकिन कर्मफल पर हमारा कोई अधिकार नहीं है।

34. ’कर्म’ पर ध्यान दें, ’कर्मफल’ पर नहीं

गीता के श्लोक 2.47 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमें कर्म करने का ही अधिकार है, कर्मफल पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। वह आगे कहते हैं कि कर्मफल हमारे किसी भी कार्य के लिए प्रेरणा नहीं होना चाहिए और यह भी कि हमें अकर्म की ओर झुकना नहीं चाहिए।

33. 'सुख और दुख’ से खुद को मुक्त्ति करेंा

एक बार कुछ दोस्त यात्रा कर रहे थे और उन्हें एक चौड़ी नदी पार करनी थी। उन्होंने एक नाव बनाई और नदी को पार किया। फिर उन्होंने अपनी बाकी यात्रा के लिए भारी नाव को ढोकर अपने साथ ले जाने का फैसला किया, यह सोचकर कि यह उपयोगी होगा।

32. ’मन की शांति’ की आधारशिला

श्रीकृष्ण कहते हैं (2.41), कर्म योग में, बुद्धि निश्चयात्मिका (जो बिल्कुल दृढ़ हो) होती है और जो अस्थिर हैं उनकी बुद्धि बहुत भेदों वाली होती है।

31. ’बड़ा लाभ’ देते है ’छोटे प्रयास’

श्रीकृष्ण (2.40) आश्वासन देते हैं कि कर्म योग की दिशा में किया थोड़ा सा प्रायस भी परिणाम देता हैं और यह धर्म (अनुसासा) बड़े भय से हमारी रक्षा करता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जहां सांख्य योग शुद्ध जागरूकता है, वहीं कर्मयोग में प्रयास करना पड़ता है।

30. पानी, रेत और पत्थर पर लिखावट

श्रीकृष्ण कहते हैं (2.39) कि सांख्य (2.11-2.38) के बारे में स्पष्ट करने के बाद वे अब योग (या कर्मयोग) की व्याख्या करेंगे, जिसके अभ्यास से व्यक्ति कर्म बंधन से मुक्त हो जाएगा।

29.’संतुलन’ कुंजी है

श्लोक 2.38 गीता के संपूर्ण सार को दर्शाता है। इसमें अर्जुन से श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि वह सुख और दुख, लाभ और हानि, और जय और पराजय समान समझकर युद्ध करे तो उसे कोई पाप नहीं लगेगा। समझने वाली बात है कि यह हर प्रकार के कर्म पर लागू होता है।

28. ’परमात्मा’ के साथ एक होना

श्रीकृष्ण स्वधर्म (2.31-2.37) और परधर्म (3.35) के बारे में बताते हैं और अंत में सभी धर्मों (18.66) को त्यागकर परमात्मा के साथ एक होने की सलाह देते हैं।

27. यही है ’स्वर्ग’ और ’नरक’

कृष्ण ने अर्जुन से कहा (2.25) कि आत्मा अदृश्य, अकल्पनीय और अपरिवर्तनीय है और एक बार जब आप इस बात को समझ जाते हैं, तो शरीर के लिए शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं रहती।

26. ’गुलाब’ कभी ’कमल’ नहीं बन सकता

श्रीकृष्ण स्व–धर्म (स्वयं की प्रकृति) (2.31-2.37) के बारे में बताते हैं और अर्जुन को सलाह देते हैं कि क्षत्रिय के रूप में उन्हें लड़ने में संकोच नहीं करना चाहिए (2.31) क्योंकि यह उनका स्व–धर्म है।

25. अहंकार जाने पर मिलती है ’मंजिल’

कृष्ण कहते हैं (2.29) कुछ इस (आत्मा) को चमत्कार के रूप में देखते हैं, कुछ इसे चमत्कार बताते हैं, अन्य लोग इसे चमत्कार के रूप में सुनते हैं, इस के बावजूद ‘कोई भी’ इसे बिल्कुल नहीं’ जानता।

24. पुराने शरीरों को बदल लेती है ’आत्मा’

श्री कृष्ण कहते हैं (2.19, 2.20) कि आत्मा न मारती है और न मरती है। यह अजन्मी, शाश्वत, परिवर्तनहीन और प्राचीन है। आत्मा शरीर उसी तरह बदलती है, जैसे हम नए वस्त्र पहनने के लिए पुराने वस्त्रों को त्याग देते हैं।

23. शरीर नहीं ’आत्मा’ को पहचानो

कृष्ण ने अर्जुन से कहा (2.25) कि आत्मा अदृश्य, अकल्पनीय और अपरिवर्तनीय है और एक बार जब आप इस बात को समझ जाते हैं, तो शरीर के लिए शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं रहती।

22.सुख–दुख में संतुलन ही ’परमानंद‘ है।

गीता (2.14) के आरंभ में कृष्ण कहते हैं कि इंद्रियों का बाह्य विषयों से मिलन सुख और दुख का कारण बनता है। वह अर्जुन से उन्हें सहन करने के लिए कहते हैं, क्योंकि वे अनित्य हैं।

21. 'रचनात्मकता' से होता है ’सृजन’

अंतरात्मा को समझने की खोज में दो प्रकार के बुद्धिमान लोगो ने मानवता का मार्गदर्शन किया है। एक सकारात्मक पक्ष को देखता है तो दूसरा नकारात्मक पक्ष को ।

20. मृत्यु हमें नहीं मारती

श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा , "कोई समय, भूत, वर्तमान या भविष्य ऐसा नहीं है, जब आप, मैं और युद्ध के मैदान में मौजूद ये शासक नहीं थे, हैं या रहेंगे (2.12)।"

19. 'रचनात्मकता' की कभी मौत नहीं होती

सत् और असत् पर श्री कृष्ण आगे 'उस' पर चिंतन करने के लिए कहते हैं जो अविनाशी है और सभी में व्याप्त है (2.17)।

18. सत् एवं असत्

कृष्ण कहते हैं कि सत् (वास्तविकता/स्थायित्व) कभी समाप्त नहीं होता और असत् (असत्य/अस्थायी) का कोई अस्तित्व नहीं है और ज्ञानी वह है जो दोनों के बीच अंतर कर सके (2.16)।

17. चार प्रकार के ‘भक्त’

श्री कृष्ण के अनुसार चार प्रकार के भक्त होते हैं। पहला भक्त जीवन में जिन कठिनाइयों और दुखों का सामना कर रहा है, उनसे बाहर आना चाहता है।

16. गुणों पर ‘जीत’ पाना

श्री कृष्ण कहते हैं कि किसी कर्म का कोई कर्ता नहीं होता है। कर्म वास्तव में तीन गुणों के बीच परस्पर प्रभाव का परिणाम है – ‘सत्’ , ‘रज’ और ‘तम’ जो प्रकृति का हिस्सा हैं।

15. ’समानता’ की भावना

समत्व (समभाव / समता) एक सामान्य सूत्र है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कई बार समत्व-भाव, समत्व-दृष्टि और समत्व-बुद्धि की विशेषताओं पर प्रकाश डाला है । समत्व को समझना आसान है लेकिन आत्मसत् करना मुश्किल है। हमारे भीतर समत्व की मात्रा, आध्यात्मिक यात्रा में हमारी प्रगति का सूचक है।

14. ’सत्व’, ’तमो’ और ’रजो’ गुण

हम में से अधिकांश लोगों का मानना है कि हम अपने सभी कार्यों का कारण आपने भाग्य के स्वामी हैं। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि गुणों (लक्षण/चरित्रों) के बीच बातचीत से कर्म बनता है, न कि किसी कर्ता के कारण।

13. इंसान के बस में केवल ’कर्म’ है

यदि एक शब्द संपूर्ण गीता का वर्णन कर सकता है तो वह ‘दृष्टा’ (साक्षी) होगा, जो कई संदर्भों में इस्तेमाल होता है। इसकी समझ महत्वपूर्ण है क्योंकि हम में से अधिकांश लोग सोचते हैं कि सब कुछ हम ही करते हैं और स्थितियों को नियंत्रित करते हैं।

12. सीखिए ’मन’ को नियंत्रण करना

अर्जुन मन की तुलना वायु से करता है और जानना चाहता है कि इसे कैसे नियंत्रित किया जाए, ताकि यह संतुलन बनाए रखे। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह निश्चित रूप से ऐसा करना कठिन है लेकिन इसे वैराग्य के अभ्यास से प्राप्त किया जा सकता है।

11. ’सुख—दुख’ जीवन के दो पहलू

विचारों की भिन्नता/द्वैतवाद को पार करना, गीता में एक और अचूक निर्देश है। श्रीकृष्ण बार-बार अर्जुन को यह अवस्था प्राप्त करने की सलाह देते हैं।

10. दिमाग ’दोधारी’ तलवार जैसा

गीता में कई अचूक उपाय हैं जो कई दरवाजे खोलने और आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने की क्षमता रखते हैं। ऐसी ही एक अचूक उपाय है, स्वयं को दूसरों में और दूसरों को स्वयं में देखना।

9. 'हमारी दुश्मन’ बंद मुट्ठी

गीता में, भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि आप स्वयं अपने मित्र हैं और स्वयं अपने शत्रु हैं।

8. जीवन को दीजिए सही ’ दिशा ’

पतवार से जुड़े एक छोटे–से यंत्र ’ट्रिम टैब’ में हल्का–सा बदलाव बड़े जहाज की दिशा बदल देता है। इसी तरह, गीता का अध्ययन करने के लिए एक हल्का–सा स्पर्श हमारे जीवन में पाठ्यक्रम को नया रूप दे सकता है।

7. तप कर ही सोना कुंदन बनता है।

श्रीमद् भगवद्गीता का जन्म युद्ध के मैदान में हुआ था और वर्तमान महामारी का समय कुरुक्षेत्र युद्ध के समान है। गीता में एक वाक्यांश निमित्तमात्र (सर्वशक्तिमान के हाथों में एक उपकरण) बड़े करीने से इसका सार प्रस्तुत करता है।

6. इरादे को पहचानें

गीता आंतरिक दुनिया में सद्भाव बनाए रखने के बारे में है और कानून बाहरी दुनिया में व्यवस्था बनाए रखने के बारे में है। किसी भी कर्म के दो भाग होते हैं, एक इरादा है और दूसरा उसे पूरा करना।

5. ज्ञान, कर्म और भक्ति योग

गीता अलग-अलग लोगों को उनके दृष्टिकोण के आधार पर अलग दिखाई देती है। गीता में तीन अलग-अलग मार्ग बताए गए हैं। कर्मयोग, सांख्ययोग और भक्तियोग। मन उन्मुख व्यक्ति के लिए कर्मयोग आदर्श है। सांख्ययोग ज्ञान के लिए है और भक्ति हृदय के लिए है।

4. दिमाग का खेल

गीता हमारी इंद्रियों पर जोर देती है, क्योंकि वे हमारे आंतरिक और बाहरी दुनिया के बीच के द्वार हैं। तंत्रिका विज्ञान(न्यूरोसाइंस) ने कहा है, ‘‘न्यूरॉन्स जो एक साथ इक_ा काम करते हैं एक साथ जुड़ते करते हैं।’’ गीता के शब्द भी अपने समय की भाषा का प्रयोग करते हुए ऐसा ही संदेश देते हैं।

3. 'कर्मफल' पर अधिकार नहीं

गीता इस बारे में है कि हम क्या हैं। यह सत्य को जानने के अलावा सत्य होने जैसा है और ऐसा तब होता है जब हम वर्तमान क्षण(समय) में केंद्रित (अंतरिक्ष) होते हैं।

2. मंजिल एक, रस्ते अनेक

जैसा कि कहा गया है, ‘‘सभी सड़कें रोम की ओर ले जाती हैं,’’ गीता में दिए गए सभी मार्ग हमें अंतरात्मा की ओर ले जाते हैं। कुछ रास्ते एक-दूसरे के विपरीत प्रतीत होते हैं। हालांकि, यह एक चक्र की तरह है जहां दोनों तरफ की यात्रा हमें उसी मंजिल तक ले जाएगी।

1. अहंकार

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते।। युद्ध की बात करना आसान होता है। युद्ध करना कठिन है। ऐसा ही अर्जुन के साथ हुआ। ऐसा हम सबके साथ होता है। उसका समाधान हमें श्रीमद्भागवत गीता से मिलता है।

 

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