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131. भ्रमों को पार करना

श्रीकृष्ण ने प्रकृति जनित तीन गुणों के बारे में उल्लेख किया है और हम सभी उनके द्वारा अलग-अलग कर्मों को अलग-अलग तरीकों से करने के लिए बाध्य हैं (3.5)।  वास्तव में, सभी कर्म

130. अज्ञेय को जानना

श्रीकृष्ण ने अपनी परम प्रकृति को ‘जीवन तत्व’ के रूप में वर्णित किया जो ब्रह्माण्ड को सहारा देता है (7.5) और सूत्र का उदाहरण देते हैं जो एक सुंदर आभूषण बनाने के लिए मणियों को

129. भगवान ‘पासा’ खेलते हैं

शुरु आाती ब्रह्माण्ड के सृजन के समय, यह सिर्फ ऊर्जा थी और बाद में पदार्थ का आकार लिया।  वैज्ञानिक रूप से, यह स्वीकार किया जाता है कि ब्रह्माण्ड में तापमान, घनत्व और

128. हर अंत एक शुरुआत है

श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘मैं तुम्हारे लिए इस विज्ञान सहित तत्वज्ञान को सम्पूर्ण कहूँगा, जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता’’ (7.2)।  यह

127. सीखने के लिए सुनना सीखो

एक द्विआयामी नक्शा का उपयोग त्रिआयामी क्षेत्र के दर्शाने के लिए किया जाता है। यह एक आसान, उपयोगी और सुविधाजनक तरीका है, लेकिन इसकी भी सीमाएँ हैं।  इसको समझने के लिए हमें

126. योगी सर्वश्रेष्ठ है

श्रीकृष्ण कहते हैं, योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वाले से भी योगी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन, तुम योगी बनो (6.46)।

125. भाग्य का आधार

अर्जुन पूछते हैं कि यदि कोई श्रद्धा के साथ वैराग्य का अभ्यास करते हुए उसमें सिद्धि प्राप्ति के मार्ग में, सिद्धि प्राप्त करने से पहले ही मर जाता है (6.37), तो क्या उसे अभ्यास

124. मेहनत का कोई विकल्प नहीं है

जीने का तरीका चाहे जो कुछ भी हो, श्रीकृष्ण ने अनंत आनंद प्राप्त करने के लिए एकत्व में स्थापित होने की बात की (6.31)।  एकत्व प्राप्त करने में हमारे सामने तीन प्रमुख बाधाएँ हैं

123. पूरी मानवता का सावल

कुछ सदियों पहले यूरोप में अमेरिका के अस्तित्व के बारे में कोई नहीं जानता था। जब कोलम्बस वहां पहुंचा, तो यह उसकी समझ के बाहर था कि एक विशाल महाद्वीप खोजे जाने की प्रतीक्षा कर

122. सभी में परमात्मा को देखना

परमात्मा के रूप में आते हुए, श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘‘जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मेरे अंतर्गत देखता

121. नमस्ते की ताकत

‘नमस्ते’ या ‘नमस्कार’ का प्रयोग भारतीय सन्दर्भ में एक दूसरे का अभिवादन करने के लिए किया जाता है। इसका अर्थ है ‘आप में देवत्व को प्रणाम’। विभिन्न संस्कृतियों में

120. सभी में स्वयं और स्वयं में सभी को देखना

अस्तित्व व्यक्त जैसे हमारा शरीर और अव्यक्त या आत्मा (स्व) का समन्वय है। हम अस्तित्व को या तो व्यक्त के माध्यम से या अव्यक्त के माध्यम से अनुभव कर सकते हैं। हम व्यक्त से

119. जागरूकता और करुणा का मिलन

समत्व उन सभी ज्ञानीजन के उपदेशों का सार है जो कभी इस धरती पर आए थे। उनके शब्द, भाषा और तरीके अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन संदेश समत्व प्राप्त करने का है। इसके विपरीत कोई भी उपदेश

118. परिवर्तन ही स्थायी है

वस्तुओं की भौतिक या प्रकट दुनिया में परिवर्तन स्थायी है और अव्यक्त या आत्मा अपरिवर्तनीय रहती है। इन दोनों के बीच सामंजस्य लाने के लिए एक तंत्र की जरूरत होती है। रूपक के

117. संयम की कला

कई वजहों से मस्तिष्क एक अद्भुत अंग है। इसकी विशेषताओं में से एक यह है कि यह दर्द महसूस नहीं करता क्योंकि इसके ऊतक में दर्द संचरित करने वाले नोसिसेप्टर नहीं होते हैं।

116. अध्यात्म का सहज मार्ग

आध्यात्मिक पथ के बारे में आम धारणा यह है कि इसका अनुसरण करना कठिन है। श्रीकृष्ण ने पहले ऐसे लोगों को आश्वासन दिया था कि छोटे प्रयास कर्म योग में बड़ा लाभ पहुंचाते हैं (2.40)। वे

115. ध्यान की एक विधि

श्रीकृष्ण कहते हैं कि आप या तो अपने मित्र हैं या अपने शत्रु (6.6)। अपना मित्र बनने के लिए उन्होंने सुख-दु:ख की भावनाओं के प्रति (6.7), सोने-पत्थर जैसी चीजों के प्रति (6.8) और

114. अति सर्वत्र वर्जयेत

श्रीकृष्ण ने सोना, पत्थर और मुट्ठी भर मिट्टी को बराबर मानने की बात कहने के बाद (6.8), कहा कि ‘‘सुहृद, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, घृणित और बन्धुगणों में, धर्मात्माओं में और

113. परिस्थितियों को स्वीकार करना

श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘जिसका अंत:करण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना समान

112. भीतर के शत्रु से सावधान

श्रीकृष्ण कहते हैं कि, व्यक्ति स्वयं को अपना उद्धार करने और अपने को अधोगति में डालने के लिए जिम्मेदार है (6.5)।  श्रीकृष्ण इस जिम्मेदारी को निभाने का एक मार्ग सुझाते हैं जब

111. स्वयं से मित्रता

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ‘‘मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले, क्योंकि यह मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है’’ (6.5)।

110. द्वंद्वातीत से शांति

श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘जिसको शास्त्र संन्यास कहते हैं उसी को तू योग जान, क्योंकि संकल्पों का त्याग न करनेवाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता’’ (6.2)। इससे पहले श्लोक 4.19 में

109. जो कर्मफल त्याग दे वही संन्यासी

जीवन में बहुत से उतार चढ़ाव आते हैं। यह निर्भर करता है कि हम उनसे कैसे निपटते हैं। यह स्वाभाविक है कि जब कोई मुश्किल दौर से गुजर रहा होता है तो वह निराश हो जाता है और कर्मों

108. भय को पार करना

श्रीकृष्ण कहते हैं, वे लोग जो इच्छा (काम) और क्रोध से मुक्त हैं, जिनका मन नियंत्रित है और जो आत्मज्ञानी हैं, वे इस दुनिया और परे दोनों में पूरी तरह से मुक्त हैं (5.26)। प्रश्न यह है

107. आनन्द के लिये ध्यान

पीनियल ग्रंथि एक मटर के आकार का, पाइन शंकु के प्रतिरूप का अंग है जो मस्तिष्क के केंद्र में, सीधे दो भृकुटि के बीच में स्थित होता है। शारीरिक रूप से यह न्यूरोट्रांसमीटर

106. खुशियों का लगाम

एक बार, मध्य एशिया से घोड़े पर सवार होकर एक आक्रमणकारी ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और विजय जुलूस निकालना चाहा। एक हाथी को सजाया गया और उस पर चढऩे के बाद उसने हाथी की लगाम

105. चिरस्थायी आनंद

श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो दिव्य ज्ञान की पक्की समझ रखते हैं और भ्रम से बाधित नहीं होते हैं, वह न तो कुछ सुखद पाने में आनन्दित होते हैं और न ही अप्रिय का अनुभव करने पर शोक करते

104. निष्पक्षता प्राप्त करना

श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिसका मन और बुद्धि उस (आत्मा) में स्थित है और जिनके पाप जागरूकता से दूर हो गए हैं, वे बिना किसी वापसी की स्थिति में अर्थात शास्वत अवस्था में पहुंच जाते

103. पुण्य और पाप की जड़ें

श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की ही रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है’’ (5.14)। परमेश्वर एक

102. परिणाम का समभाव से स्वीकार

श्रीकृष्ण कहते हैं कि योगी, संङ्गं (आसक्ति) को त्यागकर, केवल इंद्रियों-शरीर, मन और बुद्धि द्वारा अंत: करण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं (5.11)। यह व्याख्या की जाती है कि भले ही

101. कमल के पत्ते का अनुकरण

प्रत्येक भौतिक प्रणाली अलग-अलग इनपुट लेती है और कुछ आउटपुट उत्पन्न करती हंै। हम शब्दों और कर्मों जैसे अपने आउटपुट को लगातार मापते या आंकते हैं। हम दूसरों के कार्यों के

100. छोड़ दे अज्ञानता में जीना

जीवन एक दोतरफा प्रक्रिया है। हमें विभिन्न उत्तेजनाएं प्राप्त होती हैं और हम उनका जवाब देते रहते हैं।  इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘तत्व को जानने वाला

99. द्वेष का त्याग करें, कर्म नहीं

अज्ञान के कारण व्यक्ति भौतिक संपत्ति को हड़पने में लगा रहता है जिससे कर्मबंधन में बंधता है। जब जागरूकता की पहली किरण उतरती है, तो वह त्याग के बारे में सोचने लगता है जैसे

98. रास्ते अलग, ’मंजिल’ एक

अर्जुन पूछते हैं, हे कृष्ण, आप कर्म-संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर भी आप उनके निष्पादन की सलाह भी देते हैं। मुझे निश्चित रूप से बताएं, कौन सा बेहतर मार्ग है (5.1)।  पहले भी

97. ज्ञान की तलवार

श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘जिसने योग द्वारा कर्म को त्याग दिया है और अपने संदेहों को ज्ञान से दूर कर दिया है, वह स्वयं में स्थिर हो जाता है; कर्म उसे नहीं बांधता है (4.41)। अत: हृदय

96. बुद्धि स्वयं में है

एक बार सृष्टा सोच रहा था कि उस बुद्धि को कहाँ छिपाया जाए जिसे पाकर कुछ भी पाने को शेष न रहे। उसकी पत्नी एक ऊंचे पहाड़ पर या गहरे समुद्र में रखने का सुझाव देती है। लेकिन दोनों

95. पाप के समुद्र के लिए ज्ञान रूपी नाव

कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान अर्जुन का विषाद उसकी इस भावना के कारण है कि वह पाप कर रहा है। उसे लगता है कि अपने शिक्षकों, रिश्तेदारों और दोस्तों को मारना  पाप के अलावा और कुछ

94. सीखने की कला

जीवन भर सीखने की क्षमता एक मानवीय अक्षय निधि है। मूल प्रश्न यह है कि कैसे सीखें और क्या सीखें।   श्रीकृष्ण कहते हैं, जो ज्ञानी सत्य को जान गए हैं, उनको साष्टांग प्रणाम कर,

93. संतुष्टि ही अमृत

श्रीकृष्ण ने दो स्थानों (3.9 से 3.15 और 4.23 से 4.32) पर यज्ञ रूपी नि:स्वार्थ कर्म की बात की।    वह सावधान करते हैं कि प्रेरित कार्य हमें कर्मबंधन में बांधते हैं और अनासक्ति, जो

92. स्वास के माध्यम से आनंद

मानव शरीर में कुछ गतिविधियां जैसे दिल की धडक़न स्वचालित होती है, हालांकि वे एक निर्धारित लय का पालन जरूर करती हैं जबकि कुछ गतिविधियों जैसे लिम्बिक सिस्टम को नियंत्रित किया

91. स्वयं का अध्ययन

‘मन में आग’ होने का अर्थ है भौतिक दुनिया में अपनी इच्छाओं, रुचियों और कर्तव्यों का पालन करने के लिए ऊर्जा और उत्साह से भरा होना। जब ऐसी ऊर्जा का उपयोग आत्म-साक्षात्कार

90. बलिदान का बलिदान करना

यज्ञ बलिदान या निस्वार्थ कार्यों का प्रतीक है। इस सन्दर्भ में, श्रीकृष्ण कहते हैं कि, कुछ योगी देवताओं के लिए यज्ञ करते हैं; अन्य लोग बलिदान को ब्रह्म की अग्नि में बलिदान

89. स्वयं को मुक्त करना

अनासक्ति और वीतराग जैसे कुछ शब्द गीता का मूल उपदेश हैं। जबकि आसक्ति और विरक्ति दो ध्रुव हैं, अनासक्ति का मतलब इन ध्रुवों को पार करना है। इसी तरह, वीतराग न तो राग है और न ही

88. पाप के पहलू

विकर्म (निषिद्ध कर्म) या पाप का प्रश्न बहुत जटिल है। अर्जुन भी इसी दुविधा में है और कहता है कि युद्ध में संबंधियों को मारने से पाप ही लगेगा (1.36)। वास्तव में, संस्कृतियों ने

87. 'काम' और 'संकल्प' का महत्व

प्रत्येक संस्कृति ने समाज में शांति के लिए क्या करें और क्या न करें जैसी बातें तय की हैं और न्याय प्रणाली के विकास के साथ, 'क्या न करें' दंडनीय अपराध बन गए हैं। आपराधिक

86. सीखो बच्चे की तरह 'खुश' रहना

एक भूखी लोमड़ी ने ऊपर लटके हुए अंगूरों तक पहुंचने की कोशिश की, असफल रही और सोचने लगा कि अंगूर खट्टे हैं । यह कहानी निराशा, तृप्ति और खुशी से निपटने के मुद्दे पर कई विचार

85 'कर्म', 'अकर्म' और 'विकर्म

'एक्ट ऑफ कमीशन एंड ओमिशन' (कृताकृत और भूल चूक) आमतौर पर कानूनी शब्दावली में इस्तेमाल किया जाने वाला एक वाक्यांश है। उचित समय पर ब्रेक लगाने में विफल रहने वाले चालक ने चूक

84. 'कर्म बंधन' से मुक्ति

श्री कृष्ण कहते हैं कि कर्मों के फल में मेरी कामना नहीं है, इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बंधता (4.14 ) । यह श्री

83. असत्य सत्य पर पनपता है

जिस दुनिया को हम जानते हैं, उसमें सच और झूठ दोनों हैं। सावधानीपूर्वक जांच करने से पता चलता है कि असत्य और कुछ नहीं बल्कि सत्य की गलत व्याख्या है, या तो हमारी परिस्थितियों के

82. हम जो 'बोते' हैं वही 'काटते' हैं

भौतिक चीजें हमारे व्यवहार और गुणों द्वारा नियंत्रित होती हैं। श्री कृष्ण सभी शक्तिशाली अव्यक और प्रकट संबंधों के बारे में संकेत करते हैं जब वह कहते हैं, "जो भक्त मुझे जिस

81. गीता में 'मैं' का अर्थ

गीता में अर्जुन और श्री कृष्ण दोनों 'मैं' का प्रयोग करते हैं, लेकिन अर्थ और उपयोग के संदर्भ अलग हैं। अर्जुन का 'मैं उनके भौतिक शरीर, संपत्ति, भावनाओं और विश्वासों को

80. 'माया' की अभिव्यक्ति

जिस प्रकार एक पहिए को घूमने के लिए एक स्थिर या अपरिवर्तनशील चाक की आवश्यकता होती है, उसी तरह निरंतर बदलते भौतिक संसार को अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए शांत और

79. 'समय से परे'

भगवद् गीता दो स्तरों का एक सुसंगत सम्मिश्रण है और हमें गीता को समझने के लिए इसके बारे में जागरूक होने की आवश्यकता है। कभी-कभी श्री कृष्ण मित्र या मार्गदर्शक के रूप में

78. 'इच्छा की शक्ति'

इच्छाओं से भरे तुलसीदास अपनी नवविवाहित पत्नी से मिलने 1 के लिए बेताब थे। वह एक लाश को लकड़ी का लट्ठा समझकर रात में नदी पार कर गए। दीवार पर चढ़ने के लिए एक सांप को रस्सी के रूप

77. 'अतीत' के गुलाम न बनें

श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जिस प्रकार धुएं से अग्नि और मैल से दर्पण ढंक जाता है तथा जिस प्रकार जे से गर्भ ढका रहता है, उसी प्रकार 'काम' के द्वारा यह ज्ञान ढंका रहता है (

76 - 'काम' से रहें सावधान

अर्जुन पूछते हैं (3.36), 'तो - फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है। "यह सबसे आम सवाल है जो जागरूकता पैदा होते ही उठता है । श्री कृष्ण कहते

75 - 'धर्म एक है'

श्री कृष्ण कहते हैं कि ( 3.35) अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए - परधर्म से गुणरहित स्वधर्म अति उत्तम है। स्वधर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और परधर्म भय को देने वाला है। यह जटिल

74 - 'श्रद्धा' आनंद लाती है

श्री कृष्ण कहते हैं (3.31) कि जो मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं।   श्रद्धा का अर्थ

73. 'समर्पण की कला'

श्री कृष्ण ने अर्जुन (3.30 ) से कहा मुझ अंतर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशा रहित, ममतारहित और ज्वररहित होकर युद्ध कर। यह

72. 'धारणाओं' का कैदी

श्री कृष्ण कहते हैं कि 'प्रकृति के गुणों से अत्यंत मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतः न समझने वाले मंदबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतः जानने

71 . कोई किसी से 'श्रेष्ठ या निम्न नहीं'

श्री कृष्ण कहते हैं कि ( 3.27) वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अंतः करण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता

70 . उचित नहीं 'जल्दबाजी '

एक फल विकसित होने और पकने के लिए अपने मूल पेड़ से पोषक तत्व प्राप्त करता है। फिर वह अपनी यात्रा शुरू करने के लिए पेड़ से अलग हो जाता है। मूल वृक्ष से मुक्ति की यात्रा से अंत

69. सीखिए 'गीता' को जीवन में लागू करना’

दैनिक जीवन में हम अपनी पसंद के कुछ कर्मों से जुड़ जाते हैं। इसे आसक्ति कहते हैं। हम कुछ कर्मों से नफरत की वजह से अलग हो जाते जिसे विरक्ति कहा जाता है। परन्तु श्री कृष्ण एक

68. एक जैसी हो 'कथनी और करनी'

बच्चे दुनिया को समझने, नई चीजें, शिष्टाचार, व्यवहार आदि सीखने के लिए अपने माता-पिता की ओर देखते हैं और इसीलिए कहा जाता है कि बच्चे को पालने का सबसे अच्छा तरीका है, कथनी और

67. 'श्रेष्ठता का मार्ग'

श्री कृष्ण हमें विश्वास दिलाते हैं। कि ( 3.19 ) अनासक्ति (आसक्ति और विरक्ति को पार करना) सहित कर्म करने से व्यक्ति श्रेष्ठता को प्राप्त होता है। वह राजा जनक ( 3.20 ) का उदाहरण देते

66. 'समर्पण' या ' 'संघर्ष'

जीने के दो तरीके हैं- एक है 'संघर्ष' और दूसरा 'समर्पण'। समर्पण युद्ध में पराजितों के समर्पण की तरह असहाय समर्पण नहीं है, यह जागरूकता और सक्रिय स्वीकृति के साथ समर्पण

65  'निःस्वार्थ कर्म 'से बढ़ कर कुछ नहीं

जल पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है और श्री कृष्ण निःस्वार्थ कार्यों को समझाने के लिए वर्षा का उदाहरण ( 3.14) देते हैं। मूल रूप से बारिश एक चक्र का एक हिस्सा है, जहां गर्मी के कारण

64. 'कर्म' के बिना शरीर बेकार हो जाएगा

श्री कृष्ण कहते हैं (3.8), तू नियत कर्तव्य कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर बेकार हो जाएगा। मानव शरीर के अस्तित्व के

63. 'कर्म' का महत्व'

यदि हम कर्म के कर्ता नहीं हैं, तो कर्ता कौन है ? श्री कृष्ण जवाब देते हैं (3.5) “कोई भी कर्म किए  बिना एक पल भी नहीं रह सकता क्योंकि सभी को कर्म करने के लिए प्रकृति से पैदा हुए

62. 'मोक्ष' के दो मार्ग

श्री कृष्ण उत्तर देते हैं (3.3), 'जैसा कि मैंने पहले कहा, इस संसार में मोक्ष के दो मार्ग हैं-ज्ञानी ज्ञान के माध्यम से और योगियों के लिए कर्म के मार्ग से।" यह श्लोक इंगित करता

61. 'अनिश्चित मन' के लिए निश्चितता

  गीता के तीसरे अध्याय को 'कर्म योग' के रूप में जाना जाता है, जो श्लोक 2.71 का विस्तार है, जहां श्री कृष्ण ने कहा कि 'निर- अहंकार' शाश्वत अवस्था को प्राप्त करने का मार्ग

60 . विषाद से ज्ञानोदय तक

श्री कृष्ण कहते हैं (2.70) कि - जैसे विभिन्न नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, उसी प्रकार वही पुरुष परम शान्ति

59. 'इंद्रियों' को अपने नियंत्रण में रखो

श्री कृष्ण कहते हैं, " सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, वह एक ज्ञानी के लिए दिन के समान है और जिस दिन के समय नाशवान जन सांसारिक सुख की प्राप्ति के लिए जागते

58 - 'इच्छाओं' के विनाशकारी परिणाम

श्री कृष्ण कहते हैं कि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु चलाती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय पुरुष की

57 - अपनी 'भावनाओं' को काबू में रखो

श्री कृष्ण कहते हैं 'अयुक्त (असंतुलित) मनुष्य' में बुद्धि और भावना दोनों नहीं होतीं । परिणामस्वरूप उसे न तो शांति मिलती है और न ही खुशी । श्री कृष्ण ने यहां समत्व पर जोर

56 . जीवन में 'संतोष' है सबसे बड़ा धन

श्री कृष्ण कहते हैं कि मन की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही

55. 'दुष्चक्र' में फंसने से बचें

दुष्चक्र और गुणी चक्र घटनाओं का एक क्रम है जहां एक घटना दूसरे की ओर ले जाती है और परिणामस्वरूप आपदा या खुशी में बदलती है। यदि खर्च आय से अधिक है और व्यक्ति उधार एवं कर्ज के

54. 'इंद्रियों' के चक्कर में फंसने से बचो

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपशचितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः श्री कृष्ण ने अर्जुन को सावधान किया कि अशांत इंद्रियां बुद्धिमान पुरुष के मन को भी जबरन

53. ’इंद्रिय वस्तुओं’ की लालसा को छोडऩा

श्रीकृष्ण कहते हैं (2.59)  इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले व्यक्ति से इन्द्रिय वस्तुएं दूर हो जाती हैं, लेकिन रस (लालसा) जाती नहीं और लालसा तभी समाप्त होती है

52. जरूरी है ’इंद्रियों’ पर नियंत्रण

श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसे कछुआ अपने अंगों को खोल के भीतर समेट लेता है, वैसे ही जब पुरुष इन्द्रियों को सब प्रकार विषयों से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है

कर्तापन' की भावना को छोडऩा

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम सफलता तथा असफलता जैसी ध्रुवियताओं को त्याग कर कार्य करोगे तो वह समत्व ही योग कहलाता है। दूसरे शब्दों में, हम जो कुछ भी करते हैं, वह

51. घृणा भी एक बंधन है (

हम किसी स्थिति, व्यक्ति या किसी कार्य के परिणाम के लिए तीन में से एक नामांकन करते हैं: शुभ, अशुभ या कोई नामांकन नहीं। श्रीकृष्ण इस तीसरी अवस्था का उल्लेख करते हैं और कहते हैं

50. ’सुख और दुख’ जीवन के हिस्से

श्रीकृष्ण कहते हैं (2.56) कि स्थितप्रज्ञ वह है जो न तो सुख से उत्तेजित होता है और न ही दुख से विक्षुब्ध होता है। वह राग, भय और क्रोध से मुक्त होता है।   यह श्लोक 2.38 का विस्तार है

49. ’वर्तमान क्षण’ में जीना

अर्जुन के प्रश्न के जवाब में श्रीकृष्ण कहते हैं कि (2.55), स्थितप्रज्ञ स्वयं से संतुष्ट होता है। दिलचस्प बात यह है कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न के दूसरे भाग का जवाब नहीं

48. ‘कामनाओं’ का त्याग कीजिए

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के 2.11 से 2.53 तक श्लोकों में सुध सांख्य (जगरूपता) का खुलासा किया, जो अर्जुन के लिए पूरी तरह से नयी बात थी। अर्जुन आगले श्लोक (2.54)  में ‘स्थितप्रज्ञ’ (जो

47. ’भ्रम’ से बचो

जीवन के सामान्य क्रम में जब हम एक ही विषय पर परस्पर विरोधी राय सुनते हैं, तो हम भ्रमित हो जाते हैं - चाहे वह समाचार, दर्शन, दूसरों के अनुभव और विश्वास हों। श्रीकृष्ण कहते हैं

46. क्या ’हमारा’ है और क्या नहीं

श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूप दलदल को भलीभांति पार कर जायेगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आनेवाले इस लोक और परलोक सम्बन्धी सभी भोगों से वैराग्य को

45. जन्म-मृत्यु के भ्रमपूर्ण बंधन

श्रीकृष्ण कहते हैं कि संतुलन बुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होनेवाले फल को त्यागकर जन्मरूपी बन्धन से मुक्त हो निर्विकार परमपद को प्राप्त हो जाते

44. संतुलित ’निर्णय’ लेना

हम सभी विभिन्न कारकों के आधार पर अपने, अपने परिवार और समाज के लिए कई निर्णय लेते हैं। श्रीकृष्ण हमें ये निर्णय लेने को अगले स्तर तक ले जाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जब वे

43. सीखिए ’तटस्थ’ रहना

हम अपने कार्यों और निर्णयों के साथ-साथ दूसरों के कार्यों को भी अच्छे या बुरे के रूप में नामकरण करने का आदी हो चुके है।   श्रीकृष्ण कहते हैं कि समबुद्धि युक्त पुरुष पुण्य

42. ’अहंकार’ से बचो

श्रीकृष्ण ने देखा कि अर्जुन अहंकार की भावना से अभिभूत है और यही उसके विषाद का कारण है। श्रीकृष्ण अर्जुन को सलाह देते हैं कि वह अहंकार को तोडऩे और स्वयं तक पहुँचने के लिए

41. खुद को जानने के लिए कीजिए बुद्धि का उपयोग

हमारे अंतरिक और बाहरी हिस्सों का मिलन ही योग है। इसे कर्म, भक्ति, सांख्य, बुद्धि जैसे कई मार्गों से प्राप्त किया जा सकता है। व्यक्ति अपनी प्रकृति के आधार पर उसके अनुकूल

प्रभुत्व की कुंजी है ’आत्मज्ञान’

कर्ण और अर्जुन कुंती से पैदा हुए थे लेकिन अंत में विपरीत पक्षों के लिए लड़े। अर्जुन के साथ महत्वपूर्ण लड़ाई के दौरान शाप के कारण कर्ण का युद्ध ज्ञान और अनुभव उसके बचाव में

कर्म फल' वह नहीं जो प्रतीत होता है

हम आमतौर पर यह समझने के लिए पर्याप्त समझदार नहीं हैं कि वर्तमान में हम जिस कर्मफल की इच्छा रखते हैं, वह आगे चलकर हमारे लिए अच्छा होगा या नहीं। जैसा कि एक असफल रिश्ते में होता

 

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