
श्री कृष्ण कहते हैं 'अयुक्त (असंतुलित) मनुष्य' में बुद्धि और भावना दोनों नहीं होतीं । परिणामस्वरूप उसे न तो शांति मिलती है और न ही खुशी । श्री कृष्ण ने यहां समत्व पर जोर दिया है।
जब तक व्यक्ति 'मध्य' में केन्द्रित नहीं होता, तब तक वह मित्र, शत्रु, कार्य, जीवनसाथी, संतान, धन, सुख, शक्ति, संपत्ति आदि जैसे 'अन्य' केन्द्रों में से किसी एक पर अपने आप को स्थिर कर लेता है और यही उसकी पहचान बग जाती है।
यदि कोई धन पर केंद्रित है, तो उसकी सभी योजनाएं और कार्य अन्य सभी चीजों, जैसे रिश्तों, स्वास्थ्य आदि की कीमत पर धन को अधिकतम करने केइर्द-गिर्द घूमते हैं। सुख जिसका केन्द्र हो, वह धोखा देने या सुख प्राप्त करने के लिए कुछ भी करने से नहीं हिचकिचाता है। एक जीवनसाथी उन्मुख व्यक्ति पूरी दुनिया का मूल्यांकन इस बात पर करता है कि उसके जीवनसाथी के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। कोई शत्रु केंद्रित हो सकता है, यह सोचकर कि अपने दुश्मनों को कैसे नुक्सान पहुंचाए, भले ही उससे खुद को नुक्सान पहुंचे।
जब हम दूसरों से बंधे होते हैं, तो हमारी शांति उनके हाथों में होती है, जो हमें आश्रित बनाती है। इसलिए श्री कृष्ण समत्व पर जोर देते हैं, जहां हम मध्य में केंद्रित होते हैं जो परम स्वतंत्रता (मोक्ष) है।
श्री कृष्ण 'भाव' शब्द का प्रयोग करते हैं, जो हमारी भावनाओं की समझ से अलग है, हम अपनी भावनाओं से बराबरी करने का प्रयास करते हैं। कोई भी व्यक्ति या पदार्थ, जब 'मैं’ से बंधा होता है, तो गहरी भावनाओं का आह्वान करता है, अन्यथा, वे हमारे दिल को छू भी नहीं सकते। इसका छू तात्पर्य यह है कि हमारी सभी भावनाएं व्यक्तिपरक हैं, लेकिन श्री कृष्ण समत्व से उत्पन्न होने वाले भाव का उल्लेख कर रहे हैं, जो समान है, चाहे उसमें 'मैं' शामिल हो या नहीं।
हमारा परिवेश अप्रिय, अराजक और परेशान करने वाला हो सकता है, लेकिन वे बीच में रहकर आंतरिक सद्भाव प्राप्त करने वाले को प्रभावित नहीं कर सकते और श्री कृष्ण इसे शांति प्राप्त करना कहते हैं, जो अंततः हमें आनंद देती है।