भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। यह शीर्षक निम्नलिखित श्लोक से लिया गया है जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं नाशवान कार्य प्रकृति (सृष्टि) से परे हूँ और अविनाशी आत्मा (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसलिए, वेदों और जगत में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है" (15.18)।
एक बार जब जागरूकता स्थापित होने लगती है, तो हमारे सामने दो मूलभूत प्रश्न आते हैं: हमें क्या करना चाहिए और हमें क्या जानना चाहिए? श्रीकृष्ण ने पहले प्रश्न के उत्तर में हमारे सभी कर्मों को उनको अर्पण करके हमें ममत्व रहित (निर्-मम) और आशा रहित (निर्-आशा) रहने को कहा था (3.30)। श्रीकृष्ण दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं, "जो ज्ञानी पुरुष मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं, वास्तव में वे सब कुछ जानते हैं। वे पूर्ण रूप से मेरी पूजा करते हैं" (15.19)। हालाँकि यह एक सरल और खुला रहस्य है, 'सब कुछ जानना' तब सम्भव होता है जब जानना अस्तित्वगत स्तर पर होता है।
श्रीकृष्ण ने हमें हर समय उनका स्मरण करने का निर्देश दिया था, और अब वे हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ उनकी आराधना करने के लिए कहते हैं। हर क्षण और अपनी प्रत्येक कोशिका के साथ उनकी आराधना करना असम्भव प्रतीत होता है। इस पहेली की कुंजी पहले दी गई है, 'सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सभी प्राणियों को देखना और उन्हें सर्वत्र देखना' (6.29 और 6.30)।
श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं, "मैंने तुम्हें वैदिक ग्रंथों का अति रहस्ययुक्त (गोपनीय) शास्त्र समझाया है। इसे समझकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है और अपने प्रयासो में परिपूर्ण हो जाता है" (15.20)। इसका तात्पर्य यह है कि इस संसार में इस ज्ञान को प्राप्त करना ही हमारा परम कर्तव्य है।
श्रीमद्भागवत पुराण में, श्रीकृष्ण ने उपरोक्त श्लोकों में जो कहा है, उनके साक्षात्कार करने का एक सरल मार्ग बताया है। वे कहते हैं कि जब हम किसी चोर, गधे या शत्रु को देखें, तो उनमे हम आत्मतत्त्व रूप श्रीकृष्ण को ही महसूस करें। निश्चित रूप से, यह समझना आसान है, लेकिन आचरण में लाना कठिन है। मूलतः, सबके पीछे वही पुरुषोत्तम हैं |
https://epaper.punjabkesari.in/clip?2456407
